" मैं बढ़ता गया " ..





समय के साथ मैं बढ़ता गया ..
कभी ख़ुद को , कभी दुसरो को समझता गया ..
घड़ी की सूयिओं को चलता देखा..
पर वक़्त को चलता कभी नही ..
पहले सिर्फ सर्दियों की धुंद थी
अब सिगार का धुआँ है ..
पहले सिर्फ दो बूँद ज़िन्दगी के थे ..
अब ज़िंदगी ही बस दो बूँद है ..
सूरज क साथ सुबह हुआ करती थी
अब सूरज निकलता दिखता ही नहीं ..
बत्ती गयी तो एक शामयाना होता था ..
अब ,ये साली बत्ती जाती ही नही ..
पापा के कंधो से अच्छी कोई सवारी ही नही थी ..
आब चार पहियों से कम को तो कोइ कुछ समझता ही नही ..
तारों को गिनकर रात काटा करते थे ..

अब आसमान में तारे दिखते ही नही ..
मौसम तो हर वक़्त बदलता है ..
बादल कभी कभी ही बरसता है ..
पहले सब आसन था

अब सब जैसे नादान ..

पहले परियो की कहानी थी

अब बेजुबान जिंदगानी ..

हर अनचाही राह पर भी मैं चलता गया ..

ना चाहकर भी ना जाने क्यूँ मैं बढ़ता गया ॥ !!

.." मैं बढ़ता गया .. "
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